वृक्षों के शव पर बैठे हो
प्रश्न तुम्हारे प्रश्न हुए हैं
क्यों तपती है धरती माता
क्यों आँगन अंगार हुए हैं।
शासन और प्रशासन दोनों
डंठल बो कर कागज भरते
जंगल के रखवाले खुद ही
जंगल खा कर मिट्टी करते।
इस पावस में मेघ न बरसे
आकर वापस लौट गए हैं
तपती धरा रही प्यासी ही
ताल तलैया रीत गए हैं।
हरियाली के पोस्टर होंगे
सपनों में जंगल देखोगे
लद गए दादी के वे किस्से
मंगल जिल्दों में देखोगे।
झरनों और प्रपातों के शव
उनकी बयाँ कहानी होगी
शेष रही चट्टानो को ही
व्यथा कथा सब गानी होगी।
पीपल वट ऑवल के तरु की
हम पूजा क्यों करते हैं
वृक्षों में देवत्व बसा है
ढोंग धतूरा क्यों धरते हैं।
मेढ़ों पर बूढ़े वृक्षों की
जड़ में मठ्ठा ही भरते हैं
पंछी आ कर चुग जाएँगे
फसल हमारी हम डरते हैं।
अब अभिशाप भुगतने होंगे
हमने कुदरत से खेला है
कृत्रिम खाद ठूँस दी इतनी
मिट्टी अब केवल ढेला है।
दूर नही दिन लिख लो यारों
प्लास्टिक के ताबूत बनेंगें
बिन लकड़ी के सारे शव ही
बिजली के शव-दाह दहेंगे।
रामनारायण सोनी
(02.06.2019)

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