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Tuesday, 3 December 2019

धरा गगन आकुल है

कौन कहता है क्षितिज के पार भी आकाश होगा
कौन जाने कुछ दशक के बाद भी मधुमास हाेगा।
देख लो जी भर खिले इन शतदलों को और सर को
कौन जाने कल परिन्दों का नीड़ कोई पास होगा।।

जान लो तुम फिर नदी में रेत ना पानी बचेगा
शान से जो गिरि खड़ा है दुष्ट मानव से डरेगा।
म्यूजियम में बस लिखे इतिहास वापी कूप होंगे
निर्झरों की मृत्यु का सच कोई सावन ही कहेगा।।

फिर कहाँ कलरव सुनोगे कूजते उन पंछियों का
भोर सूनी शाम सूनी बस रुदन अमराइयों का।
बादलों के झुरमुटों में बस धुएँ की चादरें हैं
रोशनी के इस शहर पर डर बड़ी परछाइयों का।।

मौत की दहलीज पर यह विश्व दम साधे खड़ा
जिन्दगी बारूद के गोदाम जैसी लग रही है।
हिमनदों में ज्वार होंगे द्रुमदलों में खार होंगे
इस मलय में इस पवन में ज्वाल जैसी जग रही है।।

क्यों विकास के काँधे पर धरती की अर्थी धरते हो
शस्य श्यामल निखिल सृष्टि में विप्लव क्यों भरते हो।
धरती जल आकाश पवन ही जीवन प्राणाधार है 
अपने हाथों अपने घर में स्वयं पलीता क्यों धरते हो।।

०४.१२.१९

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