भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
दो फूलों का सहज सौंदर्य बिखरता है भीतर से बाहर जैसा भीतर वैसा बाहर न मुखौटे, न दुराव न त्याग, न चुनाव
अलौकिक संवाद न वाद न, न परिवाद बस मुखर ही मुखर बस आह्लाद के स्वर
रामनारायण सोनी
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