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Monday, 23 March 2020

न मैं रहूँ न मेरा कुछ

तू पानी है 
हल्दी हूँ मैं
घुल कर तुझमें 
खो कर खुद ही
बस रंग छोड़ जाऊँगी

तू हथेली है
हिना हूँ मैं
रच कर तुझमें
लकीरों की छाँह में
बस छुप कर रह जाऊँगी

करुणा सागर तू
नन्ही इक बूँद मैं
डूब कर सागर में
न मैं रहूँ न मेरा कुछ 
बस पानी रह जाऊँगी

रामनारायण सोनी



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन