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Sunday, 7 February 2021

मौन छाया बोलती है

मौन छाया बोलती है

मौन छाया भी बहुत सी बात कहती है
कान मन के तो लगा कर तू सुन जरा।

आज ठहरे इन पलों के पंछियों के साथ हो 
दो घड़ी संग घूम लें तू हाथ थामे सुन जरा।

गुगुदाते मलमली इस दूब को फिर से छुएँ
शाख पर के गुल की महक तो सुन जरा।

शाख के गुल चूमते उस चीर ही की कहानी
यह पवन देता गवाही कान देकर सुन जरा।

ढूँढ लें पदचिन्ह भी इस राह में होंगे कहीं
द्रुम दलों की आहटें यूँ बोलती है सुन जरा।

अंजुरी भर पुष्प की वे पंखुड़ी बिखरी यहाँ
पोर में खुशबू रमी है आज भी तू सुन जरा।

रामनारायण सोनी 

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन