वक्त तो वक्त
नज़र भी
कहीं और ही व्यस्त है।
जानते नहीं?
कि वे फूल
खिलते है रोज
कि कहीं दृष्टि पड़ जाए
उन पर भी, पर
शायद पता नहीं इन्सान को
मुरझाई कलियाँ,
कभी कहाँ खिलती है
आज की नदी आज बही,
कल वही कहाँ मिलती
वक्त है कि मिलता नहीं है
पर वक्त रुकता ही कब है?
*चुक जाऊँ वक्त के साथ*
तो वक्त क्या करे
*शाम के बाद दिन*
*होता ही कब है?*
रामनारायण सोनी

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