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Tuesday, 30 May 2017

जारी है


टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?


लिखते लिखते.......

लिखते लिखते.......
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👉👉👇

तुम कितने निष्ठुर हो।

कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
                सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
           .........

टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।

निवेदक
रामनारायण सोनी

🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄🕯🎄

हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।

तलाश जारी है


वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

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कवि जब उठ जागेगा


तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है

खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके

कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा

अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना
निकल पड़े हो योगी हो कर
नित अलख जगाए रखना

माँ


माँ
जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तो के कोई बोध नहीं थे
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने मुझे दिया है।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अपूर्ण पूर्ण तुम हुई


स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।

चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।

चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।

रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।

    रामनारायण सोनी

नव प्रभात का आज उदय है

आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

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