माँ
जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
मेरी अर्चन - पूजन तू।
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
मेरी अर्चन - पूजन तू।
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तो के कोई बोध नहीं थे
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने मुझे दिया है।।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
रिश्तो के कोई बोध नहीं थे
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने मुझे दिया है।।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
मेरी अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
मेरा अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
मेरा अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
मेरा अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
मेरा अर्चन - पूजन तू
माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

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