लिखते लिखते.......
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तुम कितने निष्ठुर हो।
कितने काँटों की फाँस चुभी बैठी पग में
कितने धूल भरे है इस मैले से दामन में
मेरे जीवन की झगुली में पैबन्द सिले कितने
मुझे देख क्यों फेर लिये ये दृग मुझसे तुमने
सचमुच तुम कितने निष्ठुर हो।
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टूटती वैसाखियों के जोर पर
रेंगता मानव यहाँ पंकिल डगर
आस के पंछी बिछड़ते नीड़ से
शेष अपने भाग्य में छूटा समर
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।
जो खड़े हैं आज नेपथ्य में विद्रूप से
जो डुबोते रोशनी को भी तिमिर में
क्या बुझेगी प्यास शोणित की लहू से
प्रीत की सरिता बहेगी क्या समर में ?
साथ दे कर दो कदम बोझिल हुए
आज साथी वे सयाने हो गए।।
निवेदक
रामनारायण सोनी
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हो रही हिंगुल प्रभाती सर्जनाएँ
रोलियाँ छितरी छटा छबि छैल सी
काटती जो उर बसी सब वर्जनाएँ
हो सके तो रश्मियों को अतिमान देना।।

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