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Thursday, 31 May 2018

नशा है इश्किया इसका

लगता है मेरे प्रेम-घट में
कोई सुराख सा हो गया
सहेजा जिन्दगी भर से
बूँद बूँद कर ही चू गया

मेरी यह प्रीत की दुल्हन
बस झाँकती उस कल में
जाने कौन घड़ी याद का
सर से दामन सरक गया

अब तो बारिशें खुद ही
उड़ा ले जाती रिमझिम को
ये चाँद भी रोशनी कम
जलन की बौछार कर गया

गुनाह मेरा, मेरे दिल का
नशा है इश्किया इसका
नहीं पतवार कश्ती में ये
तूफाँ पर भरोसा कर गया

Wednesday, 23 May 2018

ये गीत मेरे बस भाव मई

इनकी सौरभ और सुन्दरता
भावों की निर्मल कोमलता
ढलती है भावों के साँचों में
उतरे भाव तेरे अन्तस में
   ये गीत मेरे बस भाव मई
भावों का स्पन्दन शब्द बने
ये गीत मेरे हैं शब्द वो ही
ये भाव मेरे है बन्द वही
मेरी इनमें ही प्रीत बही
  ये गीत मेरे बस भाव मई

कैसी ये फगुनाहट है


टेसू क्या दहका है, मन क्यूँ बहका है
वसुधा का कण कण ऐसा दरका है।
गौरी के गाँव मुआ महुआ भी महका है
गंध फाग खेल रहे कनक जुही चम्पा है।।

महुए की मण्डी से ताड़ी की हण्डी से
पी पी जन डोल रहे हाट बाट मस्ती से।
मचल उठी मस्त मगन छैल छबीली गौरी भी
देते तन ताल थिरक वासंती मन गुंजन भी।।

कैसी फगुनाहट यह मदिर मदिर मौसम की
खुसुर पुसुर जाहिर है अमलतास बेला की।
अल्हड़ अलबेली ताल बजी पीपल की
बेला आ पहुंची अब साजन के आवन की।।

बजते माँदल पर थाली की थाप पड़ी
चूनर की ओटों  से गौरी की आँख भिड़ी।
रसवन्ती रसना की मादक धुन सुन
हुलसे हुरियारे की गलबाहियाँ आन जुड़ी।।

आँखाँ ही आँखों में अनुबन्ध हुए बंधन के
मल गया गुलाल गाल लिये साध जीवन के।
वनजन गिरिजन रचते यह समवेत स्वयंवर
यह भगोरिया उत्सव है गर्व करें इन पर।।

अर्चना हम कर रहे

दीप जलाने का सबब केवल यही है
रोशनी को हम निमंत्रण दे रहे।
जो अंधेरों में खड़े अभिशाप लेकर
अर्चना उनके लिए ही कर रहे।।

अधिकार-पत्र

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
सोख नजर की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद तुम्हे दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ अपना, बिना मोल हम बिक जाएँगे।।

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
मेरी ये आँख तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो प्रिय तुम कितने मेरे, जान तभी पाओगे।।

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
अधिकार नही अब मेरा मुझ पर
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।

मुक्तक

हौंसले बुलन्द हैं आपके अंधेरे माँग बैठे हो
जिन्दगी सारी की सारी हमारे नाम कर बैठे हो।
लेन देन करते हैं हम फ़कत रोशनी ही का
चौदहवीं के इस चाँद से अमावस माँग बैठे हो।।

याद का अजब स्पर्श, किसकी छुअन है ये।
आँख क्यों नम हुई किसकी तपन है ये।।
मन दौड़ दौड़ जाता है कहाँ कैसी लगन है ये।
खुशबुएँ फैली फ़िजां में महकता वही सुमन है ये।।

कहाँ आ गए हम


रिश्तों को चबाते रिश्ते
मासूमियत की कव्र पर
खड़ी गर्व की मीनारें
तब पाँच पैसे में मिल गई थी
ढेरों झमाझम खुशियां
अब बेखौफ़ यह
भुट्टे सी अकड़न।।

माटी के दिए की रोशनी
लीलते मेटल हेलाइङ्स
खपरैलों का एयरकंडीशन हुअा दफन
विकास के डोजर तले
रौंदी गई संस्कृति।।

कौड़ी महँगी, जीवन सस्ता
कहाँ आ गए हम?
रास्ते अगर ये हैं
तो गन्तव्य कैसा होगा?
बहता लावा दीखता है
वह ज्वालामुखी कैसा होगा।।

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