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Wednesday, 23 May 2018

कहाँ आ गए हम


रिश्तों को चबाते रिश्ते
मासूमियत की कव्र पर
खड़ी गर्व की मीनारें
तब पाँच पैसे में मिल गई थी
ढेरों झमाझम खुशियां
अब बेखौफ़ यह
भुट्टे सी अकड़न।।

माटी के दिए की रोशनी
लीलते मेटल हेलाइङ्स
खपरैलों का एयरकंडीशन हुअा दफन
विकास के डोजर तले
रौंदी गई संस्कृति।।

कौड़ी महँगी, जीवन सस्ता
कहाँ आ गए हम?
रास्ते अगर ये हैं
तो गन्तव्य कैसा होगा?
बहता लावा दीखता है
वह ज्वालामुखी कैसा होगा।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन