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Thursday, 19 August 2021

micro poetry

मैं समझा था
बहुत दूर आ गया हूँ उससे
मगर खाली नहीं है
उससे कोई भी जगह

रामनारायण सोनी
  २. ८.२१


चौंधियाई
मेरी आखें उम्र के साथ साथ
पर आँखें आत्मा की
देखने लगी और भी साफ साफ
फुल्ली मेच्योर्ड

शायद मैं गलत हूँ
और तुम सही
जो भी पढ़ा लिखा तुमने
शीर्ष पर प्रतिष्ठित होने को
पर, मैंने तो बस जीने भर को
संवेदनाएँ बहुत सी
फिर खड़ी हो गई है मुझ में
मेरी गलतियाँ अच्छी लगती है मुझे

There is a distance between possibly and reality we have just to travel through this distance. We have to have courage, commitment and walk through this distance.


Wednesday, 18 August 2021

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों से

तुम से तुम को मिलवाऊँ

तुम से तुम को मिलवाऊँ

आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

रामनारायण सोनी
१७.०८.२१

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों 

सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हम, तुम और वे

जैसी ही मैं बाहर निकला

किताबों, धर्मों, जातियों,
देशों-प्रदेशों, लिंगों और रंगों से
तो बिल्कुल एक से हो गए हैं
मैं, तुम, और हम सब
हमारे एक से गुण है-
जन्म और मृत्य,
हँसना और रोना,
जागना और सोना,
प्रेम और घृणा
कटने पर लाल ही खून का बहना
और हाँ
हाथ, पैर, आँख, नाक, कान
गिनतियों में सब बराबर
मैं, तुम, वह! सभी सन्तति हैं
उस असीम की, विराट की
टूक-टूक हो गए हम
हम से मैं और फिर केवल मैं
इन सीमाओं से घिरते ही
मैं अमृत का पुत्र हूँ, तुम भी, वे भी
जिसकी रचना है यह समस्त
भुवनभर हथेलियाँ हैं उसकी
रम रहा है हो कर स्पन्दन
मुझ में, तुम में, सब में

रामनारायण सोनी
०८.०८.२१

सुन ए जिंन्दगी

सुन ए जिन्दगी!
तुम्हारे पास तो मील के कई पत्थर हैं
कुछ सुडौल सुन्दर से हैं उनमें
याद करना मुझे तुम
अपनी ठोड़ी पर उँगली टिकाए
उन सुन्दर पत्थरों पर बैठ कर
फुसफुसाना अपनी जुबान मैं
और सुन कर मैं...
मैं यहाँ बैठ कर मुस्कुराऊँगा
तुम भी मुस्कुराना मेरे संग संग

रामनारायण सोनी
२६.०७.२१

सुन ए जिन्दगी!
शूलों, भूलों और
परेशानियों के पलों में
इन्हे वो कहीं देख न ले
मेरे माथे पर पड़ी सिलवटों को
छिपा कर कही रख देना
बदले में मुट्ठी भर
मुस्कान बिखेर देना!
बस!

   रामनारायण सोनी

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