जैसी ही मैं बाहर निकला
किताबों, धर्मों, जातियों,
देशों-प्रदेशों, लिंगों और रंगों से
तो बिल्कुल एक से हो गए हैं
मैं, तुम, और हम सब
हमारे एक से गुण है-
जन्म और मृत्य,
हँसना और रोना,
जागना और सोना,
प्रेम और घृणा
कटने पर लाल ही खून का बहना
और हाँ
हाथ, पैर, आँख, नाक, कान
गिनतियों में सब बराबर
मैं, तुम, वह! सभी सन्तति हैं
उस असीम की, विराट की
टूक-टूक हो गए हम
हम से मैं और फिर केवल मैं
इन सीमाओं से घिरते ही
मैं अमृत का पुत्र हूँ, तुम भी, वे भी
जिसकी रचना है यह समस्त
भुवनभर हथेलियाँ हैं उसकी
रम रहा है हो कर स्पन्दन
मुझ में, तुम में, सब में
रामनारायण सोनी
०८.०८.२१

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