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Wednesday, 5 October 2016

चाँदनी चुभती रही

क्यों हुए आतुर हमारी
नापने गहराई मन की
क्यों छुआ है घाव मेरा
जागती है पीर तन की।
चाँदनी भी चुभ रही है
जो जगाती याद उनकी
कोई चुनरी तान दे अब
तारकों की और तम की।।

सूझता ना पथ कोई भी
गर्दिशों की धुन्ध इसमें
फूल हैं न पात है अब
इस चमन की अंजुमन में।
ये कदम भी आज अँकड़े
वे नहीं हैं  जब सफर में
डूबता अभिसार गहरी
क्षोभ की नीरव निशा में।।

दीप की लौ सी किरण भर
रोशनी गलती रही
झर झराते अश्रु कण ले
मानिनी जगती रही।
आस के नभ में विचरते
स्वाँस के पंछी रुपहले
प्रीत के पाहुन पधारो
प्राण के जाने से पहले।।



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन