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Wednesday, 5 October 2016

मन की पर्तें मन ही खोले

मन है आज सखी री मेरा
बोझिल कुछ कुछ अलसा कुछ कुछ
मन की पर्तें मन ही खोले
उघरी कुछ कुछ, बिखरीं कुछ कुछ

कभी झूलता उनके संग संग
रुचिर हिंडोले कर के कुछ कुछ
मन की सिगरी मन ही खोले
हृदय गड़ी थी छाया कुछ कुछ

गाता सुनता गीत स्वयं ही
ढोल मजीरे रुनझुन कुछ कुछ
तार एक बस तानपूरे का
मेघ मल्हार ये गाता कुछ कुछ

कैसा है मन निपट बावरा
भीड़ भाड़ में खोजे कुछ कुछ
नयन कटोरे रीत गए पर
आस लगी है अब भी कुछ कुछ

तब से टँगा अलगनी पर मन
कुछ कुछ तुमने इसे कहा था
खोल किवारे लगा टकटकी,
चौंक पड़ा बिन आहट कुछ कुछ

इसके क्रन्दन के विह्वल स्वर
क्या तुम तक ना पहुँचे कुछ कुछ
या पथराई भाव नगरिया
स्मृतियाँ क्या बची है कुछ कुछ?

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन