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Wednesday, 12 October 2016

दीप कविता का जलाना चाहता हूँ

उम्र की चादर समय ने ही कुतर दी
कुछ पलों को जोड़ कर पैबंद भर दूँ,
झड़ चुके जो पात तरु के कब जुड़े
आज प्रिय कुछ पुष्प तेरे शीश धर दूँ,
मौन साधे रैन भी है घोर तम की ।
   
      रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
      दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

ढह चुका प्राचीर प्रीतम के नगर का
एक कोना ढूँढ कर बगिया सजा दूँ.
हमने बोये जो सपन थे प्यार के
भग्न आले खोज कर के ठीक कर दूँ,
फेंक कर दुःस्वप्न सारे इस घड़ी मैं।

       रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
       दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन