उम्र की चादर समय ने ही कुतर दी
कुछ पलों को जोड़ कर पैबंद भर दूँ,
झड़ चुके जो पात तरु के कब जुड़े
आज प्रिय कुछ पुष्प तेरे शीश धर दूँ,
मौन साधे रैन भी है घोर तम की ।
रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।
ढह चुका प्राचीर प्रीतम के नगर का
एक कोना ढूँढ कर बगिया सजा दूँ.
हमने बोये जो सपन थे प्यार के
भग्न आले खोज कर के ठीक कर दूँ,
फेंक कर दुःस्वप्न सारे इस घड़ी मैं।
रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।
कुछ पलों को जोड़ कर पैबंद भर दूँ,
झड़ चुके जो पात तरु के कब जुड़े
आज प्रिय कुछ पुष्प तेरे शीश धर दूँ,
मौन साधे रैन भी है घोर तम की ।
रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।
ढह चुका प्राचीर प्रीतम के नगर का
एक कोना ढूँढ कर बगिया सजा दूँ.
हमने बोये जो सपन थे प्यार के
भग्न आले खोज कर के ठीक कर दूँ,
फेंक कर दुःस्वप्न सारे इस घड़ी मैं।
रोशनी को फिर बुलाना चाहता हूँ।
दीप कविता का जलाना चाहता हूँ।।

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