सारा जग तम से भर जाए
जब सूरज अपने घर जाए
देना तुम मुझको आवाज
अदना सा दीपक हूँ तो क्या
मैं तो जलने को तत्पर हूँ
(तैल जिसे आयुर्विज्ञान स्नेह कहता है)
मुझमें स्नेह भरा है
अमल, तरल, विरल
जो उत्सर्ग के लिए खड़ा है
बाती के रस्ते दौड़ कर
अपनी अस्मिता की आस छोड़ कर
तुम्हे रोशनी देने को तत्पर है
बाती, महीन सी खोखली सी
मुझको हौले से कहती
मार्ग बनूँगी उत्सर्ग को जाते स्नेह का
मिट जाएगा स्नेह
तब मैं भी जलूँगी
जल कर भी अपने परिचय की
बन कर धुअाँ-धुअाँ
छोड़ जाऊँगी एक खुशबू
मैं भी जलने को तत्पर हूँ।।
अदना सा दीपक हूँ मैं
रोशनी पहचान मेरी
संघर्ष है स्वभाव मेरा
उजालों में मौन हूँ पर
जब हाथ को हाथ बूझे
पथिक को बाट न सूझे
जीवन रुक जाए ठिठक कर
मुझे याद करना,
मैं जलने को तत्पर हूँ।।
अन्धकार, शत्रु नही मेरा
वह मेरा चिर संगी है
गर्भ में उसके ही
ढूँढता हूँ एक कक्ष
भरता हूँ रोशनी उसमें
मैं जलने को तत्पर हूँ।
पर, ए दोस्त!
अधूरा हूँ मैं भी
सुलगने को मुझे
एक अगन चाहिए,
कोई और दीप की तपन चाहिए
जिन्दगी हो तुम्हारी उजालों भरी
इसलिए, मैं तपने को तत्पर हूँ
मैं जलने को तत्पर हूँ।।

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