जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।
वे संवाद, वे अवसाद,
वे केकी से कहकते स्वर
और मुस्कराते अरुण अधर
हवाओं में तैरते-लरजते स्पन्दन
हथेलियों पर फुदकते लम्हों
तुम कानों में कुछ कह जाते हो।।
जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।
अलकों में उलझते पोर
उन्मद हो जाता मैं अकसर
सहसा कौंधती झुरझुरी
फैलती बाहें, बोलती निगाहें
उतर कर अम्बर से आहिश्ता
जब यादों में गहराते हो।।
जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर रुबाई लिख जाते हो।।
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।
वे संवाद, वे अवसाद,
वे केकी से कहकते स्वर
और मुस्कराते अरुण अधर
हवाओं में तैरते-लरजते स्पन्दन
हथेलियों पर फुदकते लम्हों
तुम कानों में कुछ कह जाते हो।।
जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर उभर आते हो।।
अलकों में उलझते पोर
उन्मद हो जाता मैं अकसर
सहसा कौंधती झुरझुरी
फैलती बाहें, बोलती निगाहें
उतर कर अम्बर से आहिश्ता
जब यादों में गहराते हो।।
जब यादों में गहराते हो
अन्तस्तल पर रुबाई लिख जाते हो।।

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