- धरा गगन -
शाम है धुआँ धुआँ गगन पहन के गेरूआँ
चला धरा की गोद में है कँप रहा रुआँ रुआँ।
चाँद तारे टँक गये लो शामियाने सज गये
धरा गगन सुहाग भर कुछ इस तरह सिमट गए।।
मिट गए है फासले ठहर गए हैं काफिले
वे हार के सिंगार के सिलसिलों पे सिलसिले।
हैं ढोलके ढमक उठे समीर से पलास के
माँग भरती किंशुकी गीत सुन हुलास के।।
झिंगूर झूम गा उठे प्रपात झरझरा उठे
किलोल कर रहा मदन सरित स्वरों की ताल पर।
मराल माल धर धरा विराग छोड़ती मही
बिछे हुए जमी जमी माधवी, कुमुद, जुही।।
अभी विहान दूर है पात सरसरा रहे
विहाग राग भैरवी है बंदि वृन्द गा रहे।
चकोर चन्द्र चाँदनी मनोज मान मर्दिनी
प्रणय प्रखर प्रमोद है धरा गगन सुहाग भर...
...कुछ इस तरह सिमट गए।।

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