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Thursday, 4 April 2019

रूही

कैसे कह दूँ अलग हो तुम
इस रूह की तलब हो तुम
बात रूबरू मिलने की थी
मुझ में घुल ही गये हो तुम

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन