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Friday, 26 April 2019

मेरी वसीयत

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
शर्म हया की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद बहुत दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ मेरा, बिना मोल के बिक जाएँगे।।

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
अपने ये नयन तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो अजीज कितने मेरे जान तभी पाओगे।।

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
मेरा मुझ पर नही शेष अब
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन