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Saturday, 29 June 2019

मृदुहास


मन की कोरी चादर पर कुछ स्वप्न धरे हैं
अधरों पर कुछ प्यास गुलाबी ले कर आना
नयनों की कोरों में श्यामल सांझ खिली हो
मदिर मदिर मौसम का मृदुहास लिये आना।

आज तूलिका अंतस के कुछ रंग भरे बैठी है
उसके प्राणों के रेशों से तुम हौले ख़ुद उतराना।
उलझे कुन्तल के वलय सभी उलझे उलझे हों
प्रखर प्रणय की संध्या के मधुमास लिये आना।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन