"मैं वहाँ तुम यहाँ"
मैं ही उतरा था एक दिन!
जैसे परिंदा कोई
उतरता है तुम्हारे आंगन में
बहती थी जहाँ
शीतल मंद सुगन्धित समीरण
मैं ही तो था वह!
इक नन्हे बच्चे सा
अपनी खोई गिल्लियॉ लेने
आ गया हो ऐसे ही,
महके उस उपवन में
जैसे आ जाती है गोरैया
फरफराती उजालदानों पर
न दी दस्तक ही दरवाजे पर
सरसराते पत्तों ने
पुकारा था तुम्हे नाम लेकर
देखता रहा वक्त रुक कर
तुम्हारी बाहों के झूले पर
हाँ, था वह मैं ही
सिरहाने थे रेशमी अहसास
उतर न पाए थे बोल
चिपके रह गए हो जैसे
शहदीले अधरों में
लौट कहाँ पाया
पूरा मैं अब तक
छूट गया कुछ-कुछ मैं ही
साथ चल रहे हो
तब से अब तलक तुम भी
छूटे हम, पर छूटे कहाँ
फिर ख़ुद-ब-ख़ुद
एक-दूसरे को पाने को
क्योंकि, मैं हूँ वहाँ, तुम हो यहाँ
निरन्तर, अविरल, अविचल

No comments:
Post a Comment