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Saturday, 3 August 2019

दुआएँ उनकी

सब चुप थे..
दुआओं के उठे वे हाथ
..कुछ जाने पहचाने
..कुछ अपने कुछ बेगाने
पता नहीं कहाँ कहाँ से
कब कब आये
पीड़ा, कम्प, भय को
  चले गए चुपचाप
  मुझ से दूर धकेल कर

और मैं, 
   हाँ! मैं!!
जैसे धूल झाड़ कर
फिर खड़ा हो गया हूँ

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन