भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
सब चुप थे.. दुआओं के उठे वे हाथ ..कुछ जाने पहचाने ..कुछ अपने कुछ बेगाने पता नहीं कहाँ कहाँ से कब कब आये पीड़ा, कम्प, भय को चले गए चुपचाप मुझ से दूर धकेल कर
और मैं, हाँ! मैं!! जैसे धूल झाड़ कर फिर खड़ा हो गया हूँ
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