*

*
*

Tuesday, 20 August 2019

यहीं तक

यहीं से यहीं तक

दर्द के अनुबंध ले कर
  पीर छाती में गड़ी है
मौन भाषा प्रेम की है
  प्रीत द्वारे आ खड़ी है।

क्यों हृदय की वीथियाँ
  फिर हुई निस्पंद सी है
छोड़ दो मन का भरम
  यह ऋतु मधुमास सी है।

No comments:

Post a Comment

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन