भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
यहीं से यहीं तक
दर्द के अनुबंध ले कर पीर छाती में गड़ी है मौन भाषा प्रेम की है प्रीत द्वारे आ खड़ी है।
क्यों हृदय की वीथियाँ फिर हुई निस्पंद सी है छोड़ दो मन का भरम यह ऋतु मधुमास सी है।
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