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Saturday, 10 August 2019

कव्य

यह नदी अभिशप्त सी है

जल नही बहता यहाँ
यह लगभग सुप्त सी है

घाट सब मरघट बड़़े है
प्यास पीते जीव जन्तु
धार, लहरें लुप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

पालती थी सभ्यताएँ
धर्ममय और तीर्थमय हो
संस्कृति विक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

खेत बनती थी उपजती
तरबूज, खरबूज ककड़ियाँ
अब रेत केवल तप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

प्राण उसके पी गई
लोलुपी जन की पिपासा
वासनाएँ लिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

हम विकासों के कथानक
तान कर सीना दिखाते
सब शिराएँ रिक्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

बस बाढ़ ही ढोती रहेगी
शेष दिन निःश्वास होंगे
जिन्दगी संक्षिप्त सी है
यह नदी अभिशप्त सी है

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन