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Tuesday, 29 October 2019

इश्क तो बस इश्क है

जो मिलता ही नहीं है
होती है उसकी ही इबादत
ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?

इश्क इबादत है?
या इबादत ही इश्क है?
या कि यही सब इश्क ही है?

हदों के पार बेहद है
सिफर का ही सफर जद है
इश्क का सौक ही मद है

इश्क तो इश्क ही बस है

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन