भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
जो मिलता ही नहीं है होती है उसकी ही इबादत ऐसा होता क्यों है इस इश्क में?
इश्क इबादत है? या इबादत ही इश्क है? या कि यही सब इश्क ही है?
हदों के पार बेहद है सिफर का ही सफर जद है इश्क का सौक ही मद है
इश्क तो इश्क ही बस है
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