मिट्टी ने सुगबुगाया
गली मैं, तपी मैं
पर जब बना कुछ
तो नाम मेरा बदल गया
मिट्टी से हो गई हूँ "दिया"
बाहर फिर एक तपन है
बाती में फिर एक अगन है
पर अब मुझसे एक उजास है
तिमिर से तुमूल की प्यास है
गुमसुम ये राहें रोशन हुई
दिशाएँ फैल गई सब ओर
तपन में ढूँढ लिया है
मैने चिर सुख
बाँटते रहने का सुख
मैं वही अमर मिट्टी हूँ
चाहे मैं, दिया हूँ तुम्हारे लिये
मैं फिर भी वही मिट्टी हूँ
रामनारायण सोनी
(२९.१०.१९)

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