कुछ की आती नहीं
तो किसी की जाती नहीं
कुछ जा कर लौटती हैं फिर फिर
ले जाती है हमें वहाँ
तो कभी लाती हैं तुम्हें यहाँ
रखती है अकसर
दोनों को जोड़ कर
ये यादें भी ना! बड़ी अजीब है
यादें कैसी कैसी?
कभी आबादी में अकेला
तो कभी वीराने आबाद करती
खेलती हैं कभी छितरे बादलों से
बटोर लाती है वे तुम्हारे सब्ज लफ़्ज़
फुसफुसाती है प्यार से कानों में
बिम्बित करती है तुम्हें
फूलों के महकते परागण में
झिलमिलाते ताल के जल में
दौड़ती ही फिरती हैं
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ
ये यादें भी ना! कितनी करीब हैं
नाबाद है, पूँजी है, सनद है
मन की तिजोरियों में
रामनारायण सोनी
२६. १ .२१

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