कर्ज मिट्टी का
मैं गुनाहों के तले अपने दबा ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
पेट मेरा उम्र भर से तू सदा भरती रही
भूख मेरी प्यास मेरी क्यूँ अधूरी ही रही
तू जली है, तू गली है पालने संसार ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
फेंक बीजों को तुझी में सो गया घर में
तू लगी थी रात दिन ही प्यार भर उर में
एक दिन फसलें पकी मैं काट लाया हूँ
गंदगी अपनी वहीं मैं छोड़ आया हूँ
ग्लानि से अपनी ही मैं तो भर गया ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
तू धरित्री, पालियित्री इस भुवन को धर रही
इस समूची सृष्टि में ही नित नदी ये बह रही
पादपों के और तृणों के रोम तन में धारती
गर्भ में ज्वालामुखी पर उफ नही उच्चारती
जान कर भी मैं सभी यह हो रहा हूँ मूढ़ ऐसे
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
इन रगों में रक्त जो दिन रात बहता है
मेरे इस तन में तेरा ही वास रहता है
मुझ से पहले, बाद में भी तू रहेगी माँ
नस्ल मेरी, पुश्त मेरी फिर कहेगी माँ
भूल पाऊँगा कहाँ एहसान सब कैसे?
कर्ज मिट्टी का चुकाऊँ मैं कहाँ कैसे?
रामनारायण सोनी
२५-०४-२१

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