कोरोना के कालमेघ
नीड़ काँपे श्वांस के प्रस्वास पर प्रतिघात भारी।
क्रन्दनों के कण्ठ में खुद पवन भी है आज हारी।।
नील नभ की तारिका भी उम्र सी ढलती रही।
छातियाँ थी वज्र की पर रेत सी गलती रही।।
कालिमा वे मेघ की छलती रही।।
आर्तनादी स्वर स्वयं ही चीखते हैं ये निगोड़े।
रक्त के कण विप्लवी ये धार के मारे हथौड़े।।
सहचरी कर जोड़ कर बस प्रार्थना करती रही।
मृत्यु के अभिलेख ही वह रात भर पढ़ती रही।।
कालिमा वे मेघ की छलती रही।।
थी जहाँ भुजदण्ड में उस शौर्य की गौरव पताका।
पदतलों की ठोंकरों से थी टूटती गिरती शलाका।।
बोझ से पलके झुकी वे अश्रुकण झरती रही।
काँपते इस क्षीण कर से तीलियाँ गिरती रही।
कालिमा वे मेघ की छलती रही।।
दीखता न शत्रु कोई बिन समर सब लोग हारे।
वेदना से प्राण हारे देखते परिजन बिचारे।।
मृत्यु वे भीषण लकीरें भाल पर लिखती रही।
जीवनी बस आस के पल टूट कर गिनती रही।।
कालिमा वे मेघ की छलती रही।।
रामनारायण सोनी
२८.०५.२१

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