खपरैली बस्ती में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में
भींच लिये ओंठ और भींची जब आँख मेरी
मन ही मन लगता है अंबर ने पाँख धरी
भैंसों की पीठों पर फिर चढ़ बैठें मस्ती में
पोखर के छिछले से पानी की छप छप में
कनुवे की किलकारी गूँज रही ढप ढप में
आओ फिर लौट चलें, खपरैली बस्ती में।
खपरैली बस्ती में।।
तन मन सब भींग गया यादों के झुरमुट में
चूजों संग दौड़ रहा मन घूरे पर सरपट में
बोल रही शीशी में पनचक्की पुक पुक कर
कोयल जहँ कूक रही आमों के उपवन में
भर ले पोटाश जरा लोहे की गजगुण्डी में
लहसुनिया फोड़ें भित्ती पर चल मण्डी में
खपरैली बस्ती में।।
चाचा के चौंतर पर खेलें चंग पौ और चौपड़
तारा और मुन्नी की सुन पाँचों की खड़ खड़
मस्तानी टुल्लर जो खेल रही है लंगड़ी भी
खेलें ढप्पी और पव्वा नीम तले दुकड़ी भी
अन्नी-चन्नी की धूम मची चन्दन के औसारे
कपड़े की गेंद बना गधामार टप्पे भर मारे
खपरैली बस्ती में।।
रामनारायण सोनी
२६.०३.२०२१

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