थके पाँव
वक्त ने खुद ही
वक्त चुराया है हम से
मेरी दहलीज़ से टकरा कर
क्यों लौट लौट जाती हैं
हवाएँ भी फिर नेपथ्य ही में
सदाओं की उँगली थामे
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
निढाल से स्वप्न!थके पाँव!!
धुँधियाते गाँव! चुँधियाती ठाँव!!
रास्तों में बिछे अगिनत अलाव
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
अँधेरे ये चिराग तले के
उड़ उड़ कर ढँकने लगे हैं
मद्धिम पड़ती दीपशिखाओं को..
तन की डोली भी उठती नहीं है...
प्राणों की कहारिनों से!
अब तो तुम ही
मुझी तक चले आओ!!!
रामनारायण सोनी
१५.०६.२१

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