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Saturday, 24 September 2016

तू सबका ही शिल्पकार है

अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

प्रणय गंध

पोर-पोर प्रीतम की
प्रणय गंध छाई है।

भ्रमरों का भ्रम होता
उलझे से कुन्तल में
वेणी के सुमनो पर
झूम रहे गुन गुन कर
     अभी अभी पवन गंध
     अंजुरि भर लाई है।

        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

खंजन से नयनों से
ठहरी सी चितवन से
अलसाई पलकों की
झीनी सी ओट लिये
      अभी अभी चिलमन से
      झाँक उठी अरूणाई

       पोर-पोर प्रीतम की
       प्रणय गंध छाई है।

कोई सुर साज नहीं
कोई लय ताल नहीं
नीरव है रजनी भी
ठहरी है धड़कन भी
        ऐसे में पगला मन
        सुनता है शहनाई
     
        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

कैसा ये कंपन है
अधरों में, तन-मन में
वाणी जब सूख गई
आँखे सब बोल गई
     दोनों मन महक उठी
     भावों की अमराई
   
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

धरती ने गगन छुआ
सिहरन सी छाई है
तरुवर में अवगुंठन
लतिका क्यों शरमाई
       सिन्दूरी सपनों की
       बिखर गई तरूणाई
     
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

मैं गीत शान्ति के गाता हूँ

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को,
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे,
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले,
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है,
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह,
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव,
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम,
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम,
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को,
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में,
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में,
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर,
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर,
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का,
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो,
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो,
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

Thursday, 22 September 2016

नजरिया

जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।

खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।

बरगद और बाशिन्दे

बरगद और बाशिन्दे


बरगद की साखों पर पातों के झुरमुट में
शयन किये पंछी हैं राका के नीरव में।
गद्गद् हो देख रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

रोज  सुबह इनकी तो ऐसी ही आती है
सुनता हूँ भैरव का आरोहण अवरोहण।
सुनता हूँ जीवन की उमगों का स्पंदन
झूम-झूम उठता है पुलकित हो मेरा मन।।

रोली सी फ़ैल गई प्राची के अम्बर में
चिचियाते चूज़े भी भूख भरे चोंच में।
आतुर हो उचकाते पंखों को सोच में
मैं भी कल ऐसे ही नापूँगा अम्बर को।।

गद्गद् हो देख .रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

पेड़ की पीड़ा

यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

१.
जो उसे काटने आया
उसे भी छाया दे रहा है,
उसे भी प्राणवायु दे रहा है,
उसे भी फल दे रहा है,
उसे भी प्यार दे रहा है,
यह पेड़ भी बड़ा अजीब है

इसमेंं भरा सत्य है,
अजस्र प्रेम है,
पलती कोमल करुणा है,
रग-रग में कर्मयोग सना है,
यह सहिष्णु भी है,
और पालक विष्णु भी है,
शंकर सा विष पीकर
जगती के जीवन हित
बस प्राण ही उगलता है
यह पेड़ भी कितना सजीव है

तपती धूप को ओढ़ता है,
तूफान को तोड़ता है।
धरा-गगन को जोड़ता है
जमीं पकड़ कर खड़ा है,
सबसे मेरे लिये लड़ा है।
२.
अचरज से भरता है-
हर कुल्हाड़े में मैं हूँ
दुश्मन और दोस्त की,
खिड़की मे मैं हूँ
दर पर आगन्तुक की
दस्तक में मैं हूँ
घर की चौखट में,
देवों के मंदिर में मैं हूँ
बालक के पलने में और
विदा होते मानव संग में मै हूँ
३.
कातर हो तरुवर ने
अनुनय यह भेजी है
जीवन जो मेरा है
जीता हूँ तेरे हित
मर कर भी जीता हूँ
बस केवल तेरे हित
असमय में मुझे मार
सब कैसे जी पाओगे

मेरे अन्तर की
पीड़ा है बस इतनी ही
मेरे जीने की
प्यास नहीं यार मेरे
मेरे बिन इस जग में
सब कैसे जी पाओगे।


सोनं चिरैया

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?
सुन कर आँखें छलक गईं। 
उसने कहा अभी मेरे पर
बाँधो टहनी से कस कर 
अब हम संग रहेंगे हरदम
और जिएँगे जी भर-भर कर

तभी जोर का झंझा आया,
चिड़िया मन ही मन घबड़ाई
प्यार से वह बोला प्रिये तुम
उड़ जाओ मैं उड़ न सकूँगा
जाते-जाते चिड़िया बोली 
प्रियतम अपना ध्यान रहे।
...

जब तूफान थमा 
एक यथार्थ सामने खड़ा था
सूनी उस टहनी पर
वह बेजान टँगा पड़ा था
बाहर के तूफान से
भीतर का तूफान बड़ा था।
मौत से तो कई बार लड़ा पर 
जिन्दगी से पहली बार लड़ा था
हार कर जीतना चाहा पर
जीत कर हारना उससे बड़ा था

प्रीत की चादर बुनी थी
तार तार क्यों हो गई
झोलियाँ विश्वास की अब
जार जार क्यों हो गई
शाम होने से भी पहले
रात का अंधियार क्यों है 
सोम झरती चाँदनी में
गिर रही विषधार क्यों है।

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?

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