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Thursday, 22 September 2016

सोनं चिरैया

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?
सुन कर आँखें छलक गईं। 
उसने कहा अभी मेरे पर
बाँधो टहनी से कस कर 
अब हम संग रहेंगे हरदम
और जिएँगे जी भर-भर कर

तभी जोर का झंझा आया,
चिड़िया मन ही मन घबड़ाई
प्यार से वह बोला प्रिये तुम
उड़ जाओ मैं उड़ न सकूँगा
जाते-जाते चिड़िया बोली 
प्रियतम अपना ध्यान रहे।
...

जब तूफान थमा 
एक यथार्थ सामने खड़ा था
सूनी उस टहनी पर
वह बेजान टँगा पड़ा था
बाहर के तूफान से
भीतर का तूफान बड़ा था।
मौत से तो कई बार लड़ा पर 
जिन्दगी से पहली बार लड़ा था
हार कर जीतना चाहा पर
जीत कर हारना उससे बड़ा था

प्रीत की चादर बुनी थी
तार तार क्यों हो गई
झोलियाँ विश्वास की अब
जार जार क्यों हो गई
शाम होने से भी पहले
रात का अंधियार क्यों है 
सोम झरती चाँदनी में
गिर रही विषधार क्यों है।

सोन चिरैया बोली इक दिन
मुझे छोड़ तुम मेरे प्रियवर, 
उड़ कर तो न चले जाओगे ?

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन