*

*
*

Saturday, 24 September 2016

प्रणय गंध

पोर-पोर प्रीतम की
प्रणय गंध छाई है।

भ्रमरों का भ्रम होता
उलझे से कुन्तल में
वेणी के सुमनो पर
झूम रहे गुन गुन कर
     अभी अभी पवन गंध
     अंजुरि भर लाई है।

        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

खंजन से नयनों से
ठहरी सी चितवन से
अलसाई पलकों की
झीनी सी ओट लिये
      अभी अभी चिलमन से
      झाँक उठी अरूणाई

       पोर-पोर प्रीतम की
       प्रणय गंध छाई है।

कोई सुर साज नहीं
कोई लय ताल नहीं
नीरव है रजनी भी
ठहरी है धड़कन भी
        ऐसे में पगला मन
        सुनता है शहनाई
     
        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

कैसा ये कंपन है
अधरों में, तन-मन में
वाणी जब सूख गई
आँखे सब बोल गई
     दोनों मन महक उठी
     भावों की अमराई
   
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

धरती ने गगन छुआ
सिहरन सी छाई है
तरुवर में अवगुंठन
लतिका क्यों शरमाई
       सिन्दूरी सपनों की
       बिखर गई तरूणाई
     
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन