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Tuesday, 27 September 2016

अधरों की पीड़ा


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो आगम पथ में 
थकित नयन की साधे समझो 
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उसमें भ्रमर नहीं है आते
जिस कुटीर में छाव नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते
खुले नयन से स्वप्न देख् कर 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उसमें पाहुन कभी न आते
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
तुम अनंत के पथिक बिचारे
खोज रहे अनजान ठौर को
तुम आशा के दीप तुम्हारा
आलम्बन् क्या गठबंधन है
मैं विस्मित हूँ स्तम्भित हूँ
कितना विश्वास अटल है

Sunday, 25 September 2016

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को, 
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे, 
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले, 
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है, 
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह, 
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव, 
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम, 
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम, 
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को, 
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में, 
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में, 
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर, 
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर, 
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का, 
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो, 
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो, 
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।


reference

●【ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्, 
देवा भागम् यथा पूर्वे संजानाना उपासते।।'
(ऋग्वेद-)

यानी हम सब साथ-साथ चलें, प्रेमपूर्वक वार्तालाप करें, हमारे मन एक हों। जिस प्रकार हमारे विद्वान पूर्वज सौहार्दपूर्ण रहते थे, उनका अनुसरण करते हुए उसी प्रकार साथ रहें।

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्वँ शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥ (यजुर्वेद)】●

Saturday, 24 September 2016

तू सबका ही शिल्पकार है

अगणित सरवर, तरुवर, गिरिवर
हिम-आच्छदित शैल-शिखर पर
मेघ रुचिर छूते नीलाम्बर l
        इन सबका तू शिल्पकार है l 
       तेरी महिमा अमित अपार है l l

हहर-हहर कर झरते निर्झर
कल-कल बहती सरिता अविरल
हरित-वसन धरि वसुधा सुन्दर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

बिंदु, बिंदु से सिन्धु बनाता
कुंद-इंदु से रस सरसाता
पुष्प-पुष्प में गंध समाता
          इन सबका तू शिल्पकार है l
         तेरी महिमा अमित अपार है l l

अग-जग, अचर-जीव सृष्टि में
रवि-शशि आतप और वृष्टि में
अविरल है क्रम सृजन-क्षरण का
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l

विश्व सकल तेरा है मंदिर
कण-कण तेरा विलास है
सत्य सनातन मेरे प्रभुवर
          इन सबका तू शिल्पकार है l
          तेरी महिमा अमित अपार है l l
              रामनारायण सोनी 

प्रणय गंध

पोर-पोर प्रीतम की
प्रणय गंध छाई है।

भ्रमरों का भ्रम होता
उलझे से कुन्तल में
वेणी के सुमनो पर
झूम रहे गुन गुन कर
     अभी अभी पवन गंध
     अंजुरि भर लाई है।

        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

खंजन से नयनों से
ठहरी सी चितवन से
अलसाई पलकों की
झीनी सी ओट लिये
      अभी अभी चिलमन से
      झाँक उठी अरूणाई

       पोर-पोर प्रीतम की
       प्रणय गंध छाई है।

कोई सुर साज नहीं
कोई लय ताल नहीं
नीरव है रजनी भी
ठहरी है धड़कन भी
        ऐसे में पगला मन
        सुनता है शहनाई
     
        पोर-पोर प्रीतम की
        प्रणय गंध छाई है।

कैसा ये कंपन है
अधरों में, तन-मन में
वाणी जब सूख गई
आँखे सब बोल गई
     दोनों मन महक उठी
     भावों की अमराई
   
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

धरती ने गगन छुआ
सिहरन सी छाई है
तरुवर में अवगुंठन
लतिका क्यों शरमाई
       सिन्दूरी सपनों की
       बिखर गई तरूणाई
     
     पोर-पोर प्रीतम की
     प्रणय गंध छाई है।

मैं गीत शान्ति के गाता हूँ

"मैं गीत शान्ति के गाता हूँ"

वेदों की अमृत वाणी को,
अपने शब्दों में गाता हूँ।
कैसे जग में शान्ति रहे,
उनका संदेश सुनाता हूँ।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

सूरज का सबको तेज मिले,
जल स्वच्छ मिले जीवन में।
धरती का वैभव सबका है,
बसा ईश कण-कण में।।
अंबर जो मेरे ऊपर है वह,
मेरा भी है सबका भी।
औषध है तरु, पादप, पल्लव,
ध्यान रखें सब इनका भी।।

केवल अपने ही सुख को हम,
शान्ति समझ बैठे हैं।
जग के शेष प्रजाजन को हम,
विष के घूँट पिला बैठे हैं।।
अब तक पुरखों की थाती को,
हमने खूब भुनाया है।
जान नहीं पाए हम भू में,
जल में कितना गरल मिलाया है।।

शान्ति नहीं बिकती बजार में,
खोज हृदय में करनी होगी।
बाहर की मृगतृष्णा तज कर,
अन्तर की भी सुननी होगी।।
भीतर है शान्त महासागर,
आनन्द जहाँ नित बसता है।
करुणाकर की मृदु-करुणा का,
पीयूष झमाझम झरता है।।

संग चलो और मिल कर बोलो,
मन भी संग मिला लो सब में।
एक अकेले सुख को छोड़ो,
शान्ति कपोत उड़ा लो नभ में।।
ऋषियों के पावन अन्तस में
सब वेद ऋचाएं उतरी हैं।
चिन्तन की मंगल धारा के,
कुछ-कुछ संकेत बताता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।
     मैं गीत शान्ति के गाता हूँ।।

Thursday, 22 September 2016

नजरिया

जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।

खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।

बरगद और बाशिन्दे

बरगद और बाशिन्दे


बरगद की साखों पर पातों के झुरमुट में
शयन किये पंछी हैं राका के नीरव में।
गद्गद् हो देख रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

रोज  सुबह इनकी तो ऐसी ही आती है
सुनता हूँ भैरव का आरोहण अवरोहण।
सुनता हूँ जीवन की उमगों का स्पंदन
झूम-झूम उठता है पुलकित हो मेरा मन।।

रोली सी फ़ैल गई प्राची के अम्बर में
चिचियाते चूज़े भी भूख भरे चोंच में।
आतुर हो उचकाते पंखों को सोच में
मैं भी कल ऐसे ही नापूँगा अम्बर को।।

गद्गद् हो देख .रहा बरगद यह गोद में
धन्य हुआ तन मेरा पुलकित मन मोद मे।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन