| जिन पर शब्द युगों तक ठहरे |
| इन अधरों की पीड़ा समझो |
| बिछे रहे जो आगम पथ में |
| थकित नयन की साधे समझो |
| जिस उपवन में पतझड़ ठहरा |
| उसमें भ्रमर नहीं है आते |
| जिस कुटीर में छाव नहीं हो |
| उनमें पथिक नहीं रुक पाते |
| खुले नयन से स्वप्न देख् कर |
| पानी पर क्यों चित्र बनाते |
| जो बस्ती वीरान पड़ी हो |
| उसमें पाहुन कभी न आते |
| अनछुई छुअन की आस पोर को |
| तुहिन कणों की प्यास भोर को |
| तुम अनंत के पथिक बिचारे |
| खोज रहे अनजान ठौर को |
| तुम आशा के दीप तुम्हारा |
| आलम्बन् क्या गठबंधन है |
| मैं विस्मित हूँ स्तम्भित हूँ |
| कितना विश्वास अटल है |
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Tuesday, 27 September 2016
अधरों की पीड़ा
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About Me
- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन
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