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Tuesday, 30 May 2017

कवि जब उठ जागेगा


तुम अभिव्यक्त हुए उतने
जितनी मुखरित धानी है
रोक सका है कौन गंध को
पुष्पों की नादानी है

खोल किवारे अपने दिल के
और सँवारो मन के मनके
कवि तुम शक्ति लिए बैठे अन्तर में
शव भी बोल पड़े जब सुनके

कवि जब उठ जागेगा
पाषाण पिघल जावेगा
हुंकार सुनेगा यदि लोहा भी
खुद शोणित बन जावेगा

अपने भीतर के कवि को
तुम सदा जगाए रखना
निकल पड़े हो योगी हो कर
नित अलख जगाए रखना

माँ


माँ
जीवन का पहला छोर तू ही
जीवन की पहली भोर तू ही
संसृति की सृजन विधाता तू
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरी अर्चन - पूजन तू।
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
मैं गूँगा था, बोल नहीं थे
रिश्तो के कोई बोध नहीं थे
जग का पूरा शब्द कोष ही
प्रथम तुझी ने मुझे दिया है।।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
अस्थि चर्म और सारे वय में
तू ही अविरल यूँ बहती है
जैसे नभ के कण-कण में
रंजित पावन पवन रची है।
            मेरी अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।
छूट गई तू बचपन में ही
मै छुप छुप अश्रु बहाता हूँ
हर माँ की सूरत में तब से
मैं तुझे ढूँढता ही रहता हूँ
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

तू प्रथम आह, तू प्रथम थाह
तू प्रथम भोर,अभिलाषा तू
संसृति की सृजन विधाता सी
शीतल करुणा की छाया तू
            मेरा अर्चन - पूजन तू
            माँ मेरा अभिनन्दन तू।।

अपूर्ण पूर्ण तुम हुई


स्वप्न से शब्द तक
शब्द से अर्थ तक,
फर्श से अर्श तक
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।

चलो दिगंत घूम लें
प्रखर प्रभात चूम लें,
विराट विश्व की प्रभा
धरा हुई कनक मई।।

चुकी विभावरी तमी
भरा है घट अमी-अमी
प्रपात झर-झरा रहे
हुए वितान चम्पई।।

रोलियाँ बरस रही
भिंगो रही हृदय-जमीं
न मैं रहा अपूर्ण और
अपूर्ण-पूर्ण तुम हुई।।

    रामनारायण सोनी

नव प्रभात का आज उदय है

आज पुरवा दस दिशाओं से चली है
आज मेंहदी ही स्वयं दिल में घुली है
इस तमस में रोशनी बारात बन कर
चमचमा दी इस नगर की हर गली है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

साधना की सिद्धि में तप ली अपर्णा
शंभु के आशीष पाने का समय है
घुल गई तम की सुनामी लालिमा में
नीरजा उठ प्राच्य में रवि का उदय है।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

कुन्द सी थी इस शिरा में प्रीत पिघली
बज उठी शहनाइयाँ मन की गली
बोल दो प्रतिहारियों को हों सजग
आज डोली जाएगी प्रीतम - नगर।
        विगत हुआ है तम, जीवन में
        नवप्रभात का आज उदय है।।

मुक्तक

.धरा के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सी नही पाया ।

कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा घोर संघातें

इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

आँसू नहीं समझना ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल के गहरे में खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी पलकों की कोर से
मीठे से तेरे इस दिल को करदे ये खारा न कहीं

       रामनारायण सोनी

जिस उपवन को छोड़ गए तुम माली हाथो ,
उसका अब दायित्व निभाना धर्म है मेरा "
[06/05, 9:49 a.m.] रामनारायण सोनी:

Monday, 29 May 2017

लम्हा लम्हा


वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों

देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों

ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले

जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

मैं फिर भी जी गई


प्रश्न हलाहल का ही नही था
मैं तो हँस कर उसको पी गई।
पर तुमको अचरज होता है
क्यों मैं फिर भी जी गई।।

पर नीली छतरी वाले में
मेरा भी विश्वास अटल है।
फिर हर प्याला ही प्रसाद है
अमिय भरा है या कि गरल है।।

तुमने कालकूट को पूजा
मैं तो प्रभु की चरण शरण हूँ।
तुमने गरल बीज बोए हैं
मैं उस प्रभु की प्रीति-वरण हूँ।।



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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन