वो जगह तलाश करता हूँ अर्से से
गुजरे वक्त के लमहात जहाँ ठहरे हों
वो दरिया तलाश करता हूँ अर्से से
धारों के कहीं बाकी जहाँ कतरे हों
देती है गवाही ये हसीन वादियाँ जैसे
अभी हाल में तुम ही यहाँ से गुुजरे हों
नजरें हजारों घूरती रहती मुझे दर रोज
ढूँढता हूँ उनमें से जो तुम्हारी नजरें हों
ढूँढता ही रहा मुझे तुझमें एक अर्से से
वो कोई बहाना मुलाकात का तो मिले
अंजाम खोज का कोई न था जब लौटा
मेरे दिल में ढूँढा तो तुम्हीं बाबस्ता मिले
जो लम्हा साथ है उसे जी भर के जी लेना
खिली हो चाँदनी उसे जी भर के पी लेना
भुला कर दर्द के किस्से, अंधेरी रात के साए
मिले खुशियाँ जहाँ से भी, उन्हें जी भर के जी लेना।।

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