.धरा के वास्ते एक पल कभी भी जी नही पाया ।
सरल पीता रहा हरदम गरल में पी नही पाया ।
निशानी वक्ष पर मेरे सदा देते रहे तुम सब
तुम्हारे घाव के उपहार को मै सी नही पाया ।
कभी होगी रजत सी चाँदनी नभ में
कभी होगी निविड़ तम से भरी रातें
मैं बन कर दीप अपनी रोशनी लेकर
खड़ा हूँ राह में तेरी सहूँगा घोर संघातें
इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं
आँसू नहीं समझना ये दर्द उसी रुह का बोलता है
बैठा था दिल के गहरे में खुद को छिपा तहों में कहीं
बहने न दूँगा इनको अभी पलकों की कोर से
मीठे से तेरे इस दिल को करदे ये खारा न कहीं
रामनारायण सोनी
जिस उपवन को छोड़ गए तुम माली हाथो ,
उसका अब दायित्व निभाना धर्म है मेरा "
[06/05, 9:49 a.m.] रामनारायण सोनी:

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