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Wednesday, 23 May 2018

अर्चना हम कर रहे

दीप जलाने का सबब केवल यही है
रोशनी को हम निमंत्रण दे रहे।
जो अंधेरों में खड़े अभिशाप लेकर
अर्चना उनके लिए ही कर रहे।।

अधिकार-पत्र

उतर सको तो इस कागज पर
रंगों की बौछार तुम्हारी छबि को रंग डालूँगा।
सँवर सको तो इस दरपन पर
सोख नजर की अरुणिम रोली मल डालूँगा।।

झाँक सको तो मेरे मन में
पारिजात के नव पुष्पों से सेज सजी है।
लाँघ सको तो दाद तुम्हे दूँगा
मेरे उर के मंदिर की दहलीज अड़ी है।।

माँग सको तो इन प्राणों को
खुद ही चल कर पास तुम्हारे आ जाएँगे।
मोल सको तो मुफ्त मिलूँगा
सब कुछ अपना, बिना मोल हम बिक जाएँगे।।

तुम्हे देखना चाहो तुम तो
मेरी ये आँख तुम्हें मैं खुद दे देता हूँ
क्या हो तुम मेरे जीवन मे
हो प्रिय तुम कितने मेरे, जान तभी पाओगे।।

नहीं पढ़ी है अब तक तुमने
कोरी वसीयत पर केवल मेरे हस्ताक्षर है।
अधिकार नही अब मेरा मुझ पर
हक सारे के सारा अब से तेरा मुझ पर है।।

मुक्तक

हौंसले बुलन्द हैं आपके अंधेरे माँग बैठे हो
जिन्दगी सारी की सारी हमारे नाम कर बैठे हो।
लेन देन करते हैं हम फ़कत रोशनी ही का
चौदहवीं के इस चाँद से अमावस माँग बैठे हो।।

याद का अजब स्पर्श, किसकी छुअन है ये।
आँख क्यों नम हुई किसकी तपन है ये।।
मन दौड़ दौड़ जाता है कहाँ कैसी लगन है ये।
खुशबुएँ फैली फ़िजां में महकता वही सुमन है ये।।

कहाँ आ गए हम


रिश्तों को चबाते रिश्ते
मासूमियत की कव्र पर
खड़ी गर्व की मीनारें
तब पाँच पैसे में मिल गई थी
ढेरों झमाझम खुशियां
अब बेखौफ़ यह
भुट्टे सी अकड़न।।

माटी के दिए की रोशनी
लीलते मेटल हेलाइङ्स
खपरैलों का एयरकंडीशन हुअा दफन
विकास के डोजर तले
रौंदी गई संस्कृति।।

कौड़ी महँगी, जीवन सस्ता
कहाँ आ गए हम?
रास्ते अगर ये हैं
तो गन्तव्य कैसा होगा?
बहता लावा दीखता है
वह ज्वालामुखी कैसा होगा।।

Tuesday, 22 May 2018

राज पथ के राहियों से तौलना मत

लहरिया पगडंडियों का राहगिर हूँ
राजपथ के राहियों से तौलना मत।
मंजिलों की सीढ़ियाँ पर्याप्त मुझको
शिखर छूने की मुझे तुम बोलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

झेलती झंझा उदधि की हूँ मैं लहर
झील की सी शान्ति मुझ में हैं नहीं ।
पा लिया स्पन्द रव का मस्तियों में
वो चाँद की परछाइयाँ मुझ में हैं नहीं।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

छ्त मेरी नित नील तारक से मढ़ी है
पवन झलती मन्द शीतल मलय गंंधी।
है हरित वसना धरा की गोद मुद मय
चाहना फिर स्वर्ग की तुम घाेलना मत।।
राजपथ के राहियों से तौलना मत।।

Monday, 21 May 2018

मातृत्व के बीज

मैं उस माँ का अभिनन्दन करता हूँ
जो इक माँ की ही बेटी है

मैं उस माँ-बेटी का
वन्दन,अर्चन, अभिनन्दन करता हूँ
जिसके कारण हम तुम और सब है

मैं उस बेटी को प्रणाम करता हूँ
जिसमें मातृत्व के बीज पल रहे हैं

मैं उस बेटी का वन्दन करता हूँ
जिसमें नव संस्कृति के
आकार ढल रहे हैं

Friday, 11 May 2018

जिन्दगी के रंग कई रे!


नौ रंगों से है रंगी यह जिन्दगी।
करम-धरम आचार मय है बन्दगी।।

श्वेत तो उस सत्य का संधान है।
रक्त ऊर्जा की परम पहचान है।।

बैंगनी के पार तीखी मार है।
श्याम रंग तो दु:ख की भरमार है।।

नील वर्णी शान्ति की आभा अमर।
रंग पीला है उदासी की खबर।।

आसमानी वृहद अपनी गोद फैलाए खड़ा।।
हो सहिष्णु सर्वहारा भाईचारा ले बड़ा।।

रंग केशरिया उछाह उत्सर्ग है।
जिन्दगी अविराम बहते सर्ग है।।

इस धरा का रंग हरित पारिधान है।
त्याग, आर्जव, दम, शील महान है।।

रंग हर कोई नियति का मान है।
धर्म की सद् राह हो यह आन है।।

जिन्दगी इन सब रंगों की मेल है।
ईश का वरदान और नसीबा खेल है।।

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