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Monday, 21 May 2018

मातृत्व के बीज

मैं उस माँ का अभिनन्दन करता हूँ
जो इक माँ की ही बेटी है

मैं उस माँ-बेटी का
वन्दन,अर्चन, अभिनन्दन करता हूँ
जिसके कारण हम तुम और सब है

मैं उस बेटी को प्रणाम करता हूँ
जिसमें मातृत्व के बीज पल रहे हैं

मैं उस बेटी का वन्दन करता हूँ
जिसमें नव संस्कृति के
आकार ढल रहे हैं

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन