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Wednesday, 24 October 2012
Monday, 15 October 2012
कैसे इतना प्यार लिखूँ
कैसे इतना प्यार लिखूँ |
| कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ |
| सागर से नयनोँ पर अपना, यह सारा संसार लिखूँ |
| विगत वेदना लिखूँ प्रिये या, मधुर मिलन का सर लिखूँ |
| कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ |
| सांसों का थमना लिखदूँ या, धड़कन का ये ज्वार लिखूँ |
| स्वप्नों का अभिसार या, भावों का व्यापार लिखूँ |
| कम्पित अधरों भार लिखूँ या, अन्तर की हुंकार लिखूँ |
| कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ |
| कुंठित वाणी का हाल लिखूँ या विगलित तन का जार लिखूँ |
| इस मन का उस मन पर अरु उस मन का इस मन पर |
| अधिकार लिखूँ, मनुहार लिखूँ, संचार लिखूँ, संवाद लिखूँ |
| कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम, इतना सारा प्यार लिखूँ |
| तप्त धरा की प्यास लिखूँ या, मेघों का मल्हार लिखूँ |
| गुमसुम वीणा के तार लिखूँ या, घुंघुरु की झंकार लिखूँ |
| उपवन का पतझार लिखूँ या, पसरी बसंत बहार लिखूँ |
| कैसे कुछ शब्दों में प्रियतम इतना सारा प्यार लिखूँ |
| विश्वास लिखूँ, अनुबंध लिखूँ, स्वीकार लिखूँ, गलहार लिखूँ |
क्रमश: ........
मधुरास
मधुपुरी से मधुपरी को, पुष्प का न्योता मिला है
तब प्रणय की स्वामिनी का चल पड़ा यह सिलसिला है।
स्वाति के इक बूँद को यूँ , आज यह चातक मिला है
गड-गड़ाते मेघ नभ में, सन-सनन बहती पवन है।।
प्रीत की लेकर मथानी, याद का सागर मथें हम
छोड़ कर दम-शील सारे, प्यार निर्मल शुचि करें हम ।
गहन तम से जूझते इस दीप का सिंचन करें हम
प्रणय अभिलाष लेकर, प्यार की बातें करें हम।।
एहसास के सुन्दर नगर में, प्यार का उपवन सजा
मानिनी मन मौज में, मनुहार तेरी कर रहा ।
खोल दो सब गाँठ मन की, ये प्रीत की पावन कड़ी है
अंजुरी में पुष्प भर मधुरास की मंजुल घडी है।।
रामनारायण सोनी
Thursday, 11 October 2012
Monday, 24 September 2012
कितना विश्वास अटल है
कितना विश्वास अटल है
जिन पर शब्द युगों तक ठहरे
इन अधरों की पीड़ा समझो
बिछे रहे जो तेरे पथ में
थकित नयन की साधें समझो।
जिस उपवन में पतझड़ ठहरा
उनमें भ्रमर कभी न आते
जिस कुटीर में छाँह नहीं हो
उनमें पथिक नहीं रुक पाते।
खुलें नयन से स्वप्न देखते
पानी पर क्यों चित्र बनाते
जो बस्ती वीरान पड़ी हो
उनमें पाहुन कभी न आते।
अनछुई छुअन की आस पोर को
तुहिन कणों की प्यास भोर को
मैं अनंत का पथिक बिचारा
खोज रहा अनजान ठौर को।
मैं आशा का दीप दिवाना
खुद से ही अनुबंध किये हूँ
इक दिन तो लौटेंगें साजन
यह मेरा विश्वास अटल है।
रामनारायण सोनी
Saturday, 22 September 2012
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन



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