*

*
*

Monday, 24 September 2012

कितना विश्वास अटल है

कितना विश्वास अटल है 


जिन पर शब्द युगों तक ठहरे 
इन अधरों की पीड़ा समझो 
बिछे रहे जो तेरे पथ में 
थकित नयन की साधें समझो। 

जिस उपवन में पतझड़ ठहरा 
उनमें भ्रमर कभी न आते 
जिस कुटीर में छाँह नहीं हो 
उनमें पथिक नहीं रुक पाते। 

खुलें नयन से स्वप्न देखते 
पानी पर क्यों चित्र बनाते 
जो बस्ती वीरान पड़ी हो 
उनमें पाहुन कभी न आते। 

अनछुई छुअन की आस पोर को 
तुहिन कणों की प्यास भोर को 
मैं अनंत का पथिक बिचारा 
खोज रहा अनजान ठौर को। 

मैं आशा का दीप दिवाना 
खुद से ही अनुबंध किये हूँ 
इक दिन तो लौटेंगें साजन   
यह मेरा विश्वास अटल है। 

रामनारायण सोनी 


No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन