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Saturday, 25 May 2013
Wednesday, 6 March 2013
Friday, 1 March 2013
मेरे जीवन-धन तुम हो
मेरे प्रियतम तुम मेरा सब कुछ हो
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही हो वे शब्द जिन्हें मैं
निशि-दिन बोला करती हूँ
तुम ही हो वे गीत रसीले
जिनको अधरों पर बुनती हूँ ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
दर्द तुम्हारे मेरे अपने
संवेदन बन जाते हैं
मेरे तो सपने ही तुम हो
जो सच में ढल जाते हैं ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही हो वह मेघ बरसते
जिनमें भींग-भींग जाऊं मैं
तुम ही हो वह पवन झकोरा ।।
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम ही तो वह दर्पण हो
जिसमें देख दमक जाऊं मैं
तुम अतीत हो मेरे अपने
जिसमें छबि मेरी पाऊँ मैं ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
तुम हो सुन्दर खिले सुमन
जिसकी सौरभ मेरी थाती
तुम ही तो वह कथा जिसे
मैं फिर-फिर पढ़ने जाती ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
स्वाँस मेरी तुम स्पन्दन हो
तुम ही मेरे वृन्दावन हो
प्रेम चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं
तुम मेरा जीवन धन हो ।।
बोल नहीं जो बता सकूँ मै
पर मेरे जीवन-धन तुम हो ।।
mmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
वे बोल नहीं है कि तुम्हे बता सकूँ
पर तुम ही मेरा जीवन हो प्रिय.
तुम्हीं तो वो शब्द हो, जिसे मैं बोलती हूँ.
तुम्हीं तो वो गीत हो, जिसे मैं गुनगुनाती हूँ.
तुम्हीं तो वो दर्द हो, जो मेरा संवेदी हैं.
तुम्हीं तो वो बरसात हो, जिसमे भीगना मुझे चाहती हूँ .
तुम्हीं तो वो दर्पण हो प्रिय, जिसमे स्वयं को सुंदर पाती हूँ.
तुम्हीं तो मेरा वो रहस्य हो प्रिय, जग से छुपाना चाहती हूँ,
तुम्हें बस अपने ह्रदय के पास रखना चाहती हूँ.
तुम्हीं तो वो कथा हो, जिसे फिर फिर पढ़ना चाहती हूँ.
तुम्हीं तो वो सपना हो, जिस पर असीम विश्वास रखती हूँ.
तुम्हीं तो वो सख्श हो, जिसके के संग उड़ना चाहती हूँ.
तुम मेरी श्वास हो, जो मेरा स्पंदन है,
तुम जो मेरे हो, उस पर मुझे गर्व हैं,
तुम्हीं वो भावना हो, जिसे महसूस कर स्वयं को पा जाती हूँ.
तुम्हीं तो वो पुष्प हो प्रिय, जिसकी सुगंध लेना चाहती हूँ.
तुम मेरा वो अतीत हो, जिसमें मैं सदा मुस्कुराई हूँ,
तुम्हीं तो वो भविष्य हो, जिससे मैं प्रेम करती हूँ.
तुम्हीं तो मेरा वह आज हो, जिससे मैं प्रेम ही प्रेम करती हूँ.
क्योंकि तुम मेरा सब कुछ हो प्रिय
मिताली विजय
Monday, 18 February 2013
गीत बन गये
आज इस गूँगे हृदय में
क्यों गीत के अंकुर उगे
कंठ था निष्प्राण अब तक
सुप्त वंशी में यकायक सुर जगे
जिंदगी में गीत से परिचय नहीं
फिर अचानक क्यों ये मुखरित हो गए
शब्द थोथे शब्द भर थे
प्यार में तेरे सने तो शुष्क से नम हो गए
गीत जो ना रेंग पाए थे कभी
हो तरंगित अब कुलांचें भर चले
प्राण ! तुमने फूँक दी संजीवनी जब
स्वप्न बन साकार सांचों में ढले
तुमने ही गीतों के अंतर में
अधरों का मधुरस छलकाया
साये पतझड़ के छिटक गए
आह्लाद गगन में सरसाया
गीत हुए पाषाण कभी तो
तुमने ही मृदुल करों की छुअन भरी
श्वासों की डोरी तन मन में
प्रणय गंध की तपन भरी
गीत तो सूने पड़े थे नीड़ में
तेरी चपलता पा गए
लग गए सुर्खाब के पर
रंग सपने पा गए
मेरे छंदों में तुम ही तुम
मेरा इन पर अधिकार नहीं
गीतों की धड़कन तुम ही तुम
अलगाव कोई स्वीकार नहीं
रामनारायण सोनी
Thursday, 14 February 2013
तुम्हारे प्यार से जिंदगी ने पाया है
Monday, 31 December 2012
प्रथम मिलन
31.12.2012
प्रथम मिलन
प्रथम मिलन की प्रथम दृष्टि में यह कैसा सम्मोहन है
वाणी ने कर दिया समर्पण और चेतना ठिठक गई
दो जुड़े नयन दो जुड़े हृदय जब प्रीत हुई थी प्राण मई
भावों का सैलाब उमड कर रति से जागी अनुभूति नई
कोई बोल नहीं कोई बात नहीं कोई चिन्ह नहीं संकेत नहीं
कोई सोच नहीं कोई साध नहीं संसर्ग नहीं सौगात नहीं
है निर्निमेष नयनों का प्रतिपल संवाद सजल संचार प्रबल
मुदित हृदय की कोमल भुवि पर प्रेम बीज की नई फ़सल
नयनों का नेपथ्य भरा है पूर्ण समर्पण से आमंत्रण से
हृदयों का अनुबंध हुआ तब साक्षी सब बन गई दिशाएँ
देना हो जहाँ धर्म वहाँ पर पावन प्यार सृजित होता है
पाकर निर्मल प्यार जगत् में कुछ पाना शेष नहीं रहता है
रामनारायण सोनी
Monday, 24 December 2012
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- रामनारायण सोनी
- खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन

