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Friday, 22 July 2016

मुक्तक

इस ह्रदय की पीर गल कर, शब्द बनता काव्य है 
काँपती ध्वनियाँ नहीं ये वेदना के घाव हैं 
अश्रु कोरों में रुके जो, मर्म ही का स्राव है 
श्वाँस के हिम खण्ड झरते, क्रन्दनों के भाव हैं 
जिंदगी एक फ़लसफ़ा है, हमें नजरिये की तलाश हो
उम्र बँधी है वक्त से, मंजिल नहीं रास्ते की तलाश हो।
खूबसूरत हो रास्ते तो, मंजिल की पर्वाह मत कर
रास्ते तुझको लगे अच्छे, ग़ाफ़िल न हो, इख़्तियार कर।
मैनें भ्रम पाला, इसी क्षितिज, आकाश धरा से मिलता है 
दो कूल नदी के खड़े निकट, कभी नहीं कोइ मिलता है
चट्टानों से बहते सोते, शायद,  दिल उसका ही झरता है 
मेरा प्रतिबिम्ब दिखा मुझको ही, क्यों दर्पण यूँ रोता है 

Thursday, 25 February 2016

भाव निर्झर



भाव निर्झर 
चुपके चुपके कुछ कहते हैं 
आसमान के झिल मिल तारे 
भाव  भरे हैं ऐसे ही 
देखो ये शब्द हमारे 












 मिताली 

Monday, 11 January 2016

आँसू


आँसू


आँसू
तरह तरह के,
पर सभी खारे आँसू.

प्रेम के, ख़ुशी के आसू
रुदन के, विलाप के आँसू
कुटिलता के, मगरमच्छ के आँसू

प्रेम के, रुदन के गर्म हैं आँसू
पानी न समझ लेना मर्म है आँसू
ह्रदय भरे भावों से उगलता
तन-मन को भिंगो देता आँसू

अपनी जुबाँ में बोलते है आँसू
धडकनों का पता देते आँसू
अंतर के भेद खोलते आँसू
वेदना के उबलते आँसू
अपने संग हमें ले चलते है आँसू


अंचल में झेलता कोई आँसू 
अंजन को घोलता कोई आँसू 
करुणा से हमें डुबोता कोई आँसू 
दिल को गुदगुदाता कोई आँसू 
अंतस में उतरता कोई आँसू 
दिल के छाले बताता कोई आँसू
कोई साथ सिसकी भी लाता है आँसू
कोई प्रेम गंगा बहाता है आँसू
कोई भक्त मधुबन में बोता है आँसू
कोई दोस्त रिश्ते को धोता है आँसू

आँसू
तरह तरह के,
पर खरा ही होता है 
हर एक आँसू.

Friday, 18 December 2015

मेरे तुम जीवन धन हो

बोल नहीं जो बता सकूँ मैं
पर मेरे तुम जीवन धन हो

तुम ही हो वे शब्द जिसे मैं
निशि-दिन बोला करती हूँ
तुम ही हो वह गीत सुरीले 
जिसको अधरों पर बुनती हूँ। 

 दर्द तुम्हारे मेरे अपने 
संवेदन  बन जाते हैं
मेरे तो सपने ही तुम हो 
जो सच में ढल जाते हैं। 

तुम ही हो वह मेघ बरसते 
जिसमें भींग-भींग जाऊं मैं 
तुम ही हो वह पवन झकोरा 
जिस संग उड़-उड़ जाऊं मैं।

तुम ही तो वह दरपन हो 
जिसमें देख दमक जाऊं मैं 
तुम अतीत हो मेरे अपने 
जिसमे छबि मेरी पाऊँ मैं। 

तुम हो सुन्दर खिले सुमन 
जिसकी सौरभ मेरी थाती 
तुम ही तो हो कथा जिसे मैं 
फिर फिर पढ़ने जाती। 

स्वास मेरी तुम स्पंदन हो 
तुम मेरे ही वृन्दावन हो 
प्रेम-चुनरिया ओढ़ फिरूँ मैं 
तुम मेरा जीवन धन हो। 

          रामनारायण सोनी

दीपोत्सवी



















महा तिमिर में दीप अवलियां  मुक्तावली सी भाती है।
लक्ष्मी की पदरेखी मानो  स्वर्गंगा सी बहाती है ।।

सुकुमारी बालाएं देखो दीप-दान को आई है।
मानो हीरक मुक्ता मणियाँ अंजुरी भर-भर लाई हैं।।

ज्ञान-प्रभा के रश्मिपुञ्ज से आलोकित हो नितनव जीवन।
बना रहे संघर्ष पलों में अविकल अचल अथक अंतर्मन।।

Thursday, 17 December 2015

गूलर के फूल


होम करके जन्म सौ-सौ ना रुके
   गीत प्रभु हम अर्चना के गा रहे
मिल सकीं दो पटरियाँ कब रेल की
   जान कर भी हम जिए क्यों जा रहे।।

स्वप्न जन्मे ओढ़ कर झीने कफ़न
   भोर तक की उम्र ले होते दफ़न
क्यों लगे हम बीज बोने आस के
   इस जमीं की उर्वरा को नमन ।।

जन्म से प्यासे दिलों की व्यंजना
ओस के चाटे बुझी है कब जलन
हे दयामय देख लो खुद का सृजन
क्या अभी भी शेष कोई करम ।।

सब दिशाओं के क्षितिज छलना भरे
   आसमां टिकता धरा पर भासता
क्यों बनी पागल पवन पतझार में
   स्वप्न को ले उड़ चली वीरान में ।।

हम कँटीले रास्तों के हमसफ़र
   इस सफर भर दर्द की गहरी चुभन
इस चुभन से याद फिर गहरा गई
   इस चुभन को, याद को, तुमको नमन ।।

कोइ सहलाता नहीं इस दर्द को
   हाथ भी उनके पहुँच पाते नहीं
कौन तोड़े काटते इस मौन को
   अंजनों से अश्रु बाह पाते नहीं ।।

दूरियां अनगिन युगों की योजनों की
   शुष्क सरिता क्यों पड़ी तट-बंध में
हौसले, विश्वास थक कर चूर है
   जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।

इस अलौकिक प्रीत में कैसा मिलन
   यह हमारी संगिनी है, प्राण है
अब लगे मधुमास भी पतझार है
   याद की छबियां बानी आधार है ।।
   जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।

   रामनारायण सोनी

प्रभु-पद- पद्म

रे मन !

रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
प्रेम-पयस्विनी भक्ति विमल धर
रस-प्रसाद माधुर्य लिए जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

परम पुरुष वह, सञ्चित अघ-हर
ज्योति-पुञ्ज है, अंतर-तम-हर
उस करुणा वरुणालय की तू
रूप-माधुरी नित्य पिए जा।
    रे-मन मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

कुलिस कठिन वह, कलिमल हर्ता
कुसुम सुकोमल है सुखकर्ता
कण-कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
क्षीर-सिंधु स्नान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

          रामनारायण सोनी


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