होम करके जन्म सौ-सौ ना रुके
गीत प्रभु हम अर्चना के गा रहे
मिल सकीं दो पटरियाँ कब रेल की
जान कर भी हम जिए क्यों जा रहे।।
स्वप्न जन्मे ओढ़ कर झीने कफ़न
भोर तक की उम्र ले होते दफ़न
क्यों लगे हम बीज बोने आस के
इस जमीं की उर्वरा को नमन ।।
जन्म से प्यासे दिलों की व्यंजना
ओस के चाटे बुझी है कब जलन
हे दयामय देख लो खुद का सृजन
क्या अभी भी शेष कोई करम ।।
सब दिशाओं के क्षितिज छलना भरे
आसमां टिकता धरा पर भासता
क्यों बनी पागल पवन पतझार में
स्वप्न को ले उड़ चली वीरान में ।।
हम कँटीले रास्तों के हमसफ़र
इस सफर भर दर्द की गहरी चुभन
इस चुभन से याद फिर गहरा गई
इस चुभन को, याद को, तुमको नमन ।।
कोइ सहलाता नहीं इस दर्द को
हाथ भी उनके पहुँच पाते नहीं
कौन तोड़े काटते इस मौन को
अंजनों से अश्रु बाह पाते नहीं ।।
दूरियां अनगिन युगों की योजनों की
शुष्क सरिता क्यों पड़ी तट-बंध में
हौसले, विश्वास थक कर चूर है
जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।
इस अलौकिक प्रीत में कैसा मिलन
यह हमारी संगिनी है, प्राण है
अब लगे मधुमास भी पतझार है
याद की छबियां बानी आधार है ।।
जिंदगी थामे खड़ा बस प्यार है ।।
रामनारायण सोनी

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