रे मन !
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
प्रेम-पयस्विनी भक्ति विमल धर
रस-प्रसाद माधुर्य लिए जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
परम पुरुष वह, सञ्चित अघ-हर
ज्योति-पुञ्ज है, अंतर-तम-हर
उस करुणा वरुणालय की तू
रूप-माधुरी नित्य पिए जा।
रे-मन मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
कुलिस कठिन वह, कलिमल हर्ता
कुसुम सुकोमल है सुखकर्ता
कण-कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किये जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
क्षीर-सिंधु स्नान किये जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
रामनारायण सोनी
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
प्रेम-पयस्विनी भक्ति विमल धर
रस-प्रसाद माधुर्य लिए जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
परम पुरुष वह, सञ्चित अघ-हर
ज्योति-पुञ्ज है, अंतर-तम-हर
उस करुणा वरुणालय की तू
रूप-माधुरी नित्य पिए जा।
रे-मन मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
कुलिस कठिन वह, कलिमल हर्ता
कुसुम सुकोमल है सुखकर्ता
कण-कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किये जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
क्षीर-सिंधु स्नान किये जा।
रे मन-मधुप मौन तू रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
रामनारायण सोनी

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