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Thursday, 17 December 2015

प्रभु-पद- पद्म

रे मन !

रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।
प्रेम-पयस्विनी भक्ति विमल धर
रस-प्रसाद माधुर्य लिए जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

परम पुरुष वह, सञ्चित अघ-हर
ज्योति-पुञ्ज है, अंतर-तम-हर
उस करुणा वरुणालय की तू
रूप-माधुरी नित्य पिए जा।
    रे-मन मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

कुलिस कठिन वह, कलिमल हर्ता
कुसुम सुकोमल है सुखकर्ता
कण-कण में सौन्दर्य उसी का
उस पावन का गान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

उस विराट की चरण शरण में
कर अपना सर्वस्व समर्पण
श्रांत-क्लांत अगणित जन्मों से
क्षीर-सिंधु स्नान किये जा।
    रे मन-मधुप मौन तू  रह कर
    प्रभु-पद-पद्म पराग पिए जा।।

          रामनारायण सोनी


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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन