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Thursday, 21 January 2021

ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं

"ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं"

मौज में जब चलती हैं
खेलती हैं सरोवर मे शान्त जल से
उछालती हैं अलमस्त लहरों को!!
उपवन के फूलों से चुराती हैं
और ला कर उन सुगन्धों को
डाल जाती है नथुनों में मेरे
....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

सूखे बिखरे पत्तों को बजाती है
सितार की स्वर तंत्रियों सा
जगाती है उनींदी प्रणयिनी को
खोलती है वे शनै शनै
सुबह-सुबह अलसती अँखुड़ियों को
बिखेर देती है फिर अलकों को
उदात्त से उन स्कन्धों पर
देवदार की गहन छाया
ओढ़ ली हो जैसे बाजुओं पर
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

लहरा देती है चीर को
मंदिरो की ध्वजाओं सा
बिछा देती है स्निग्ध  दरियाँ
नदी की देह पर नर्म शैवाल सी
लाती हैं चिट्ठियाँ दूर दूर से
तमाल के भीने पृष्ठों पर
बिन लिखी बिन कही कहानियाँ
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं!!

उठाती है गोद में रज कणों को
झुलाती है लाड़ प्यार से
चाँद के झूले पर
बिठाती है शिखर के शीश पर
सुवर्णमयी मुकुट सा
सजाती है रंगोलियाँ
फूलों की पंखुड़ियों से
टेसू, कचनार, अमलतास, गुलमोहर की
...ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

ये हवाएँ कभी गर्म है, कभी सर्द
कभी अमृत सी पवित्र
कभी जहर सा कहर
कभी जीवन के प्रहर
कभी पंचतत्व में से एक तत्व
सबके जीवन का सत्व
सुनो सब!!!
मत छीनो इनसे इनका निसर्ग
क्योंकि ये जियेंगी भी
तो सिर्फ हमारे, तुम्हारे, सब के लिये
....ये हवाएँ हमें पुकारती हैं

....ये हवाएँ बड़ी शरारती हैं।

    रामनारायण सोनी
     २०.०१.२१

समय नही है

समय नहीं है

क्यों? समय नहीं है?
"क्योंकि समय नहीं है,"
या कि समय नहीं है?

घड़ी कि सुइयाँ समय नहीं है
प्रहर की घड़ियाँ समय नहीं है
मील के पत्थर समय नहीं है
काल के चक्र में लिखे पुराण
लिर्फ गाथाएँ है समय नहीं है!!

समय अपने समय से बीतता रहता है
हम बस कहते ही रहते हैं
समय है, पर जाने क्यों
अपने और अपनों के लिये समय नहीं है!!

उठो! जागो!!
समय कहीं यह नहीं कह डाले 
कि मेरे पास....
.....मेरे पास समय नहीं है!!!

      रामनारायण सोनी  
      २२. ०१. २१

Wednesday, 20 January 2021

जीवन कितना जी पाता है


अपने सपनों का इन्द्रजाल, सम्मोहन का महाव्याल

गगन चूमती आशाओं के, मगरी चढ़ते अमित ख्याल
उच्छ्वासों के बीच टँगी भूधर सी लिप्साएँ विशाल
युगों युगों से संघर्षो की यही कहानी दोहराता है
        जीवन कितना जी पाता है

अपने शुष्क मरुस्थल में ही मृगशावक प्यासे दौड़े
अपने घावों को धोने में निज के अश्रु हुए थोड़े
अपने तन में अपनों ने ये रिसते व्रण ही हैं छोड़े
जग के करुण कथानक में क्रन्दन से ही नाता है
             जीवन कितना जी पाता है

इस पाप-पुण्य की पोथी में काले पीले पृष्ठ भरे
कनक घटों के अन्तर में अमिय नहीं हैं जहर भरे
सच के माथे मुकुट चढ़े ये झूँठ जड़े हैं शूल धरे
पल पल के उत्पीड़न में मन टूट टूट जाता है
          जीवन कितना जी पाता है

रंगों से रँगे वितान सभी इक दिन श्याही हो जाते हैं
फूले प्रसून के पादप भी तप कर कहीं बिखर जाते है
श्यामल मेघ सुहानी सुषमा छोड़ छाड़ गल जाते हैं
झर झर करता निर्झर फिर फिर पत्थर से टकराता है
       जीवन कितना जी पाता है

पग पग पर छलती छलना में बाँह थाम कर रखना
तूफानों में इस कश्ती की पतवार थाम कर रखना
कालमेघ के भीषण रव में सिर पर हाथ धरे रहना
तेरी करणा की बरखा में यह मन भींग भींग जाता है
       तब ही जीवन जी पाता है

    रामनारायण सोनी
        २०.०१.२१

Saturday, 16 January 2021

वहीं तो हूँ

तुम पास हो तुम्हारे
मैं भी वहीं तो हूँ
मैं खो गया मुझी से
मैं भी वहीं तो हूँ

रामनारायण सोनी
२८.१२.२०२०

तुम न थी, जब तुम न थी

शब्द में हैं अर्चनाएँ



है अभी तो रक्त में 
घुलती हुई संवेदनाएँ
रागिनी से सिक्त है इन 
शब्द में ये अर्चनाएँ।
प्राण की वंशी निनादित 
हैं गमकती व्यंजनाएँ
पुष्प की सौरभ लिये 
गुंजन भरी अभ्यर्थनाएँ।।

रात जागी कामिनी के 
कुन्द होते करतलों में
कुनमुनी नलिनी अलापे 
प्रीत के मधुरिम पलों में।
रंग रांची है महावर 
नव उदित है कोंपलों में
फिर रुहानी सी कहानी 
कह रही इन शतदलों में।।

रामनारायण सोनी
२७.१२२०२०



पतझड़ फिर जीत गया


पल पल ढलते सूरज ने
लम्बा कर दिया मेरा अपना साया
एक और दिन की निर्मम
शाम का धुँधलका इसको फिर लील गया

चलो, अलाव जला लें..!
बुझते सपनों को
ताप में गुनगुना बना लें
अनचीते जुगनू से इन पलों की
मशालें फिर से सुलगा लें
मन के बढ़ते रीतेपन में
अपनों में अपने, ढूँढ रहे सपने
मावस की काली रातों में
सांसों की आस घटी, उम्र लगी कटने
जीवन की झोली के पैबन्द लगे फटने
गागर सा रीत गया,
अपना हर मीत गया
बासन्ती इस उपवन मे
पतझड़ फिर जीत गया।।
पतझड़ फिर जीत गया।।

रामनारायण सोनी
२७।१२।२०२०

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